
Monday, October 26, 2009
युगल की कथाएं

Thursday, October 8, 2009
अन्तर्राज्यीय लघुकथा सम्मेलन 3 अक्टूबर 2009
Wednesday, September 30, 2009
लोकार्पण
दर्शक दीर्घा लोकार्पण की पूरी रिपोर्ट पिछ्ली पोस्ट में पढ़े ।
Monday, September 21, 2009
शिवराम के नाटक - पुनर्नव , गटक चूरमा का लोकार्पण



Monday, September 14, 2009
राष्ट्रपिता के सपने
एक देश हुआ हिन्दुस्तान अब इंडिया हो गया है , इसके एक राष्ट्रपिता थे , जिन्होने अपनी लाठी से अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर किया । वे अंहिसावादी थे उन्होने कभी लाठी चलाई नहीं , हाँ कभी - कभी दिखा देते थे । जैसे नमक आन्दोलन में ।उनके तीन बन्दर बहुत प्रसिद्ध हुए, वास्तव में ये तीन बन्दर ही उनके सच्चे वारिस थे , जो न बुरा देखते थे न बुरा सुनते थे , न बुरा कहते थे ।
इसलिए राष्ट्रपिता के वारिसों ने न तो कभी गरीबी जैसी बुराई देखी , न उन्होने भ्रष्टाचार के किस्सों पर कान दिया । वास्तव में उन्हें ऐसी बातें सुनाई ही नहीं पड़ती थी , न ही कभी उन्होंने किसी को बुरा - भला कहा सिवाय कम्युनिस्टों को छोड़कर । बुरा - भला कहनें की उन्हें जरूरत कहाँ थी विपक्षी उनके दरबार में हाजरी दे जाते थे , अफसर , उद्योगपति , व्यापारी ठेकेदार , जमींदार उनकी सेवा में रहते और वे भी उनकी सेवा करते । जीओ और जीने दो का सिद्धांत या इसे कहें सहअस्तित्व की भावना ।
उनके वारिसों ने राष्ट्रपिता के सपनों को साकार करने के लिए पंचवर्षीय योजनाएं बनाई , जिससे इंजिनियरों , ठेकेदारों मंत्रियों , उद्योगपतियों और दलालों के विकास के साथ - साथ देश का थोड़ा बहुत विकास भी हुआ और इसी के चलते हम विकासशील देश की श्रेणी में आने लगे हैं देश को स्वावलम्बी करने के लिए विदेशों से कर्ज लिया , बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को न्योते दे देकर बुलाया ओर प्रार्थना की उनसे कि ‘आप हमारे राष्ट्रपिता के सपने साकार करें इस वास्ते नमक बनाने के हमारे अधिकार को हमने विदेशी कम्पनी ‘कारगिल’ को सौप दिये ।
खादी के विकास के लिए , बुनकरों के विकास के लिए उन्होनें बड़ी - बड़ी कपड़े की मिलें स्थापित की और कपडे का निर्यात कर विदेशी मुद्रा अर्जित करने लगे गोया विदेशी मुद्रा से प्यार हमारी देश भक्ति की सबसे बड़ी मिसाल है ।
राष्ट्रपिता की तीसरी या चौथी पीढ़ी के एक शख्स ने प्रधानमंत्री की कुर्सी से कहा कि जब भारत सरकार विकास में एक रूपया खर्च करती है तो पन्द्रह पैसे का विकास होता है । इतनी साफगोई थी इनमें । इतने सत्यवादी थे राष्ट्रपिता की तरह । कितने असहाय थे हमारे प्रधानमंत्री ।
राष्ट्रपिता ने शराबबन्दी का सपना देखा था उनके वारिसों में से एक ने गुजरात में पूर्णत: शराबबन्दी कर दी । जिससे राज्य सरकार को सालाना करोड़ो रूपयों का नुकसान होता था और शराब के धन्धों में लिप्त लागों को करोड़ों का मुनाफा होता था । इस मुनाफे को वे सद्कार्य में खर्च करते थे जैसे चुनाव फंड में पैसा देना , अस्पताल स्कूल खुलवाना , अनाथालय को दान देना जिससे उन्होनें खुब पुण्य कमाया वे रात -दिन बापूजी का गुणगान करते हैं और गांधी आश्रम को जम कर दान देते है।
Monday, August 31, 2009
मकड़ियाँ
'ज्ञानसिंधु' में आपका व्यंग्य 'क्रेडिट कार्ड' पढ़ा। बहुत बढ़िया लगा। बाज़ारवार के चलते क्रेडिट कार्ड की त्रासदी को झेलते आज के मध्यम-निम्न मध्यम वर्ग के आदमी की त्रासदी को रेखांकित करने का प्रयास दो तीन वर्ष पूर्व मैंने अपनी लघुकथा 'मकड़ियां' में किया था। इसे सबसे पहले पूर्णिमा बर्मन जी ने 'महानगर की लघुकथाएं' के अन्तर्गत अपनी वेब पत्रिका "अभिव्यक्ति" में "मकड़ी" शीर्षक से छापा था और अभी गत वर्ष 2008 में कमल चोपड़ा ने अपने वार्षिक संकलन "संरचना" भी इसे शामिल किया है। आपको यह लघुकथा भेज रहा हूँ। क्या आप इसे 'ज्ञानसिंधु' के पाठकों के सम्मुख रखना चाहेंगे ?मकड़ियाँ
सुभाष नीरव
0अधिक बरस नहीं बीते जब बाजार ने खुद चलकर उसके द्वार पर दस्तक दी थी। चकाचौंध से भरपूर लुभावने बाजार को देखकर वह दंग रह गया था। अवश्य बाजार को कोई गलत-फहमी हुई होगी, जो वह गलत जगह पर आ गया - उसने सोचा था। उसने बाजार को समझाने की कोशिश की थी कि यह कोई रुपये-पैसे वाले अमीर व्यक्ति का घर नहीं, बल्कि एक गरीब बाबू का घर है, जहां हर महीने बंधी-बधाई तनख्वाह आती है और बमुश्किल पूरा महीना खींच पाती है। इस पर बाजार ने हँसकर कहा था, ''आप अपने आप को इतना हीन क्यों समझते हैं ? इस बाजार पर जितना रुपये-पैसों वाले अमीर लोगों का हक है, उतना ही आपका भी ? हम जो आपके लिए लाए हैं, उससे अमीर-गरीब का फर्क ही खत्म हो जाएगा।'' बाजार ने जिस मोहित कर देने वाली मुस्कान में बात की थी, उसका असर इतनी तेजी से हुआ था कि वह बाजार की गिरफ्त में आने से स्वयं को बचा न सका था। अब उसकी जेब में सुनहरी कार्ड रहने लगा था। अकेले में उसे देख-देखकर वह मुग्ध होता रहता। धीरे-धीरे उसमें आत्म-विश्वास पैदा हुआ। जिन वातानुकूलित चमचमाती दुकानों में घुसने का उसके अन्दर साहस नहीं होता था, वह उनमें गर्दन ऊँची करके जाने लगा।
धीरे-धीरे घर का नक्शा बदलने लगा। सोफा, फ्रिज, रंगीन टी.वी., वाशिंग-मशीन आदि घर की शोभा बढ़ाने लगे। आस-पड़ोस और रिश्तेदारों में रुतबा बढ़ गया। घर में फोन की घंटियाँ बजने लगीं। हाथ में मोबाइल आ गया। कुछ ही समय बाद बाजार फिर उसके द्वार पर था। इस बार बाजार पहले से अधिक लुभावने रूप में था। मुफ्त कार्ड, अधिक लिमिट, साथ में बीमा दो लाख का। जब चाहे वक्त-बेवक्त जरूरत पड़ने पर ए.टी.एम. से कैश। किसी महाजन, दोस्त-यार, रिश्तेदार के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं।
इसी बीच पत्नी भंयकर रूप से बीमार पड़ गई थी। डॉक्टर ने आप्रेशन की सलाह दी थी और दस हजार का खर्चा बता दिया था। इतने रूपये कहां थे उसके पास ? बंधे-बंधाये वेतन में से बमुश्किल गुजारा होता था। और अब तो बिलों का भुगतान भी हर माह करना पड़ता था। पर इलाज तो करवाना था। उसे चिंता सताने लगी थी। कैसे होगा? तभी, जेब मे रखे कार्ड उछलने लगे थे, जैसे कह रहे हों- हम है न ! धन्य हो इस बाजार का! न किसी के पीछे मारे-मारे घूमने की जरूरत, न गिड़गिड़ाने की। ए.टी.एम.से रूपया निकलवाकर उसने पत्नी का आप्रेशन कराया था।
लेकिन, कुछ बरस पहले बहुत लुभावना लगने वाला बाजार अब उसे भयभीत करने लगा था। हर माह आने वाले बिलों का न्यूनतम चुकाने में ही उसकी आधी तनख्वाह खत्म हो जाती थी। इधर बच्चे बड़े हो रहे थे, उनकी पढाई का खर्च बढ़ रहा था। हारी-बीमारी अलग थी। कोई चारा न देख, आफिस के बाद वह दो घंटे पार्ट टाइम करने लगा। पर इससे अधिक राहत न मिली। बिलों का न्यूनतम ही वह अदा कर पाता था। बकाया रकम और उस पर लगने वाले ब्याज ने उसका मानसिक चैन छीन लिया था। उसकी नींद गायब कर दी थी। रात में, बमुश्किल आँख लगती तो सपने में जाले ही जाले दिखाई देते जिनमें वह खुद को बुरी तरह फंसा हुआ पाता।
छुट्टी का दिन था और वह घर पर था। डोर-बेल बजी तो उसने उठकर दरवाजा खोला। एक सुन्दर-सी बाला फिर उसके सामने खड़ी थी, मोहक मुस्कान बिखेरती। उसने फटाक- से दरवाजा बन्द कर दिया। उसकी सांसे तेज हो गई थीं जैसे बाहर कोई भयानक चीज देख ली हो। पत्नी ने पूछा, ''क्या बात है ? इतना घबरा क्यों गये ? बाहर कौन है ?''
''मकड़ी !'' कहकर वह माथे का पसीना पोंछने लगा।
00
Thursday, August 20, 2009
क्रेडिट कार्ड
फ्रीज खरीदना है ? पैसे नहीं है ? कोई बात नहीं , चिंता मत कीजिए , हम हैं न आपकी सेवा के लिए हमारा क्रेडिट कार्ड लीजिए, दुकानदार को दीजिए , एक साईन कीजिए और फ्रीज ले आइये । है न सरल तरीका । क्या कहा ? आपके पास आई.सी.आई.सी.आई का क्रेडिट कार्ड पहले से ही है । कोई बात नहीं , आप दूसरा लें, जरूरत आपको फिर भी पड़ सकती है । खुदा न करे बीमार हो जायें , आपरेशन कराना पड़ जाये , सीधे भरती हो जाइये , और निश्चित होकर इलाज कराएं और स्वस्थ होकर घर जायें। तब आप हमें धन्यवाद देंगे कि बंदे ने क्या चीज दी थी - क्या कहते है? , आपके पास तीन -2 क्रेडिट कार्ड हैं अच्छा है , चौथा भी लीजिए । चौथा लेने में कोई पाबंदी नहीं है ।चले जाइए ! चले जाइए ! बहुत हो गया अभी सांस लेने की जगह बची है , चौथा देकर , तुम मुझे कर्जे में पूरा ही डूबा दोगे । एक दिन ऐसा आयेगा कि मेरी लाश पंखे से झूलती नजर आयेगी ।
क्यों ? क्या हुआ मैं तो तुम्हारी सहुलियत के लिए कह रहा हूँ कूज पर मजे करने हो , हवाई जहाज का सफर करना हो , विदेश यात्रा करनी हो । होटल में रूकना हो , विदेशों में खरीद - फरोख्त करना हो क्रेडिट कार्ड सब दुखों की रामबाण दवा है । रूपया पैसा ले जाने की झंझट नहीं । चोरी -चकारी का डर नहीं । बिंदास विदेशी यात्रा करो । हमारे कार्डधारी को 20 प्रतिशत डिस्काउन्ट मिलता है और हवाई कम्पनियाँ , होटल आदि बम्पर लाटरी भी निकालते है , कहीं आपकी लाटरी लग गई तो क्या कहने , सारे कर्जे दूर , जुहू बीच पर नया बंगला , मर्सडीज बेज गाड़ी इन्तजार करेगी ।
तब तो आप हमें अवश्य धन्यवाद देंगे
‘मेरे बाप , मैं डूब चुका हूँ क्रेडिट कार्ड वाले कई तरह के चार्ज लेकर , कर्ज की राशि पर 40 प्रतिशत तक ले लेते हैं बैंक में जमा कराओं तो साले 6 प्रतिशत देते है । हमें लूटने के क्या -2 इन्तजाम कर रखे है ।
मत लीजिए । बिल्कुल मत लीजिए । मैं नहीं चाहता कि आप क्रेडिट कार्ड लें
वे अपने बैग से दूसरा फार्म निकालते हैं
‘हमारी कम्पनी 0 प्रतिशत ब्याज दर कर्ज देती है मनचाही किश्तों में भुगतान कीजिए ।
लीजिए यहाँ साइन कीजिए पैसा उठाइये और कार ले आईये , एसी. ले आइये जो चाहो सो ले आओ ,
हम आपकी सेवा में हमेशा हाजिर है ।
अब सर यह मत कहिएगा कि 0 प्रतिशत से भी कम ब्याज लें ।
वे हैं हैं कर हॅंसने लगे । वह चिंतित सा सोचने लगा साइन करे या न करे एसी. तो लेना ही हैं सो फाइनेंस कम्पनी के कागजात पर हस्ताक्षर कर देता है ।
आखिर मछली जाल में फँस ही गयी ।
Sunday, August 9, 2009
डा. शकुंतला किरण की शोध पुस्तक ‘हिन्दी लघुकथा ’ का लोकार्पण
डा. शकुंतला किरण की शोध पुस्तक ‘हिन्दी लघुकथा ’ का लोकार्पण दिनांक 26 जुलाई 2009 , जवाहर आडोटोरियम, अजमेर में लघुकथा के वरिष्ठ कथाकार भगीरथ व बलराम अग्रवाल ने किया , साथ ही उनकी ही कविता की पुस्तक ‘ एहसासों के अक्स ’ का लोकार्पण कुमार शिव व ताराप्रकाश जोशी ने किया ।इस अवसर पर बोलते हुए प्रो. अनन्त भटनागर ने कहा कि यह एक प्रामाणिक शोध प्रबंध है , जिसमें लेखिका का श्रम स्पष्ट झलकता है । हिन्दी लघुकथा के साथ - साथ अन्य भाषाओं की कथाओं का लेखा -जोखा भी लेखिका ने प्रस्तुत किया है । उन्होनें पुस्तक के पहले ,चौथे और पांचवे अध्याय का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि पहले अध्याय में उन राजनैतिक , सामाजिक , आर्थिक परिस्थितियों का वर्णन किया गया है जो लघुकथा के उदय में महत्वपूर्ण साबित हुई है लघुकथा के तात्विक विवेचन में उन्होने परिभाषा , बोधकथा , भावकथा , दंतकथा , लतीफा, कहानी आदि की अवधारणा को स्पष्ट किया है । पाँचवे अध्याय में लघुकथा की विशेषताओं और छठे में जीवन मूल्यों पर चर्चा की है ।
‘हिन्दी लघुकथा ’ पर आगे चर्चा करते हुए बलराम ने कहा कि शोध का विषय सन् 1975 में ही स्वीकृत हो गया था और 1981 तक थिसिस स्वीकृत भी हो गई थी लेकिन प्रकाशन करीब तीन दशक बाद हुआ । इस महत्वपूर्ण पुस्तक को प्रकाशन के प्रति लेखिका उदासीन ही रही । लेकिन जब इन्दौर के डा. सतीश दुबे ने बताया कि आपकी शोध के अंशों की चोरी होती जा रही है तो मित्रों के आग्रह पर उन्होने इसे अन्ततः प्रकाशित करने का मन बनाया ,
सौभाग्य का विषय है कि प्रथम लघुकथा संग्रह ‘गुफाओं से मैदान की ओर’ के सम्पादक भगीरथ व ‘हिन्दी लघुकथा’ की पहली शोध पुस्तक की लेखिका डा. शकुन्तला किरण आज दोनों मंच पर विराजमान है और दोनों राजस्थान से है । हमारे लिए यह गर्व का विषय है । इस पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण बात है कि जो मानदंड डा. शंकुतला किरण ने दिये वे आज भी लघुकथा में मान्य है ।
चर्चा को आगे बढ़ाते हुए भगीरथ ने कहा कि यह पुस्तक गहन अध्ययन , मनन , चिंतन व विशलेषण का परिणाम है । ऐसे समय जब लघुकथा आकार ग्रहण कर रही थी , जब साहित्यकार इसका नाम आते ही नाक - भौं सिकोड़ते थे , विश्वविद्यालय द्धारा इस विषय को स्वीकृती देना निश्चय ही महत्वपूर्ण रहा । इसके लिए शोधार्थी एवं राज. विश्वविद्यालय धन्यवाद के पात्र है । इनका शोध काॅपी - पेस्ट या कट - पेस्ट नहीं है जैसे कि डाॅ भटनागर ने कहा यह एक प्रमाणिक ग्रन्थ है । लघुकथा जगत में इस पुस्तक का जबरदस्त स्वागत हो रहा है और आगे के शोधार्थी इस पुस्तक के सन्दर्भ के बिना अपना शोध पूरा न कर पायेंगे । यह आलोचना की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है जिसका आने वाले कई वर्षो तक लघुकथा विमर्श में विशिष्ट स्थान रहेगा ।
डा. शंकुतला किरण ने अपने वक्तव्य में कहा कि वह लघुकथा की तरफ तेजी से आकृष्ट हुई और लघुकथा लेखन में संलंग्न हो गई । जब शोध के विषय के चयन की बात आई तो सबसे पहले मानस पर लघुकथा का विषय ही रहा । वह लघुकथा जगत से जुड़ी हुई थी इसलिए संदर्भ सामग्री के लिए ज्यादा मुश्किल नहीं पड़ी , जब आपातकाल के दौरान ‘सारिका’ के लघुकथा विशेषांक की कई रचनाओं पर सेंसर ने काली स्याही पोत दी तब उन्हें लगा कि यह एक शक्तिशाली विधा है , और वह इस शोध पर जुट गई । व्यवस्था के विकृत रूप देखने हो और उनके प्रति आक्रोश व्यक्त करना हो तो लघुकथा एक सशक्त विधा है। प्रकाशन में देरी के कारण बताते हुए कहा कि सक्रिय राजनीति और फिर आध्यात्म की ओर झुकाव ने उन्हें साहित्य के प्रति उदासीन बना दिया था लेकिन अब ‘ अहसासों के अक्स ’ कविता संग्रह और ‘ ‘हिन्दी लघुकथा ’ के प्रकाशन के साथ ही पुनःसाहित्य में प्रवृत हूँ क्योंकि अध्यात्म की तरह साहित्य भी सुकून देता है
Thursday, July 23, 2009
इक्कीसवी सदी
मदारी डुगडुगी बजाता हुआ गोलचक्कर काटता है । लोग जमा हो रहे है । लो , मजमा लग गया है ।'' हाँ तो भाईसहाब , मेहरबान , कद्रदान कमर कस कर बैठिए और एक से एक नायाब खेल देखिये ।
जमूरे !
हाँ उस्ताद
जायेगा?
हाँ जाऊंगा ।
कहाँ जायेगा ?
इक्कीसवी सदी में ।
ये मुँह और मसूर की दाल (मदारी हँसता है ) खैर , अच्छे - अच्छे खाँ इक्कीसवी सदी में जा रहे हैं तो तू पीछे क्यों ?
जमूरे !
हाँ उस्ताद
जरा पलट कर देख
इक्कीसवी सदी में जानेवाला पलट कर नहीं देखता
तो आगे देख
चकाचौंध में कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा है उस्ताद
तो ये चश्मा ले , इसे पहन और ठीक से देख अब दिखाई देता है
हाँ उस्ताद
क्या देखता है
मन्त्रीजी विदेशी कम्पनियों से तोपें , पनडुब्बियां और लड़ाकू विमान खरीद रहे हैं
और ?
और भड़वे तालियाँ बजा रहे हैं
अच्छा बता मन्त्रीजी क्या भाषण दे रहे हैं
कह रहे हैं विदेशी तकनीक और पूँजी को अपनाकर हम स्वदेशी बना रहे हैं और देश को आत्मनिर्भर कर रहे हैं
'अबे ठीक से बोल , कहीं मन्त्रीजी खुद तो आत्मनिर्भर नहीं हो रहे हैं '
मैं क्या जानू ! उस्ताद
दिमाग पर जोर डाल । विदेशों में सम्पति तो नहीं खरीद रहे हैं मन्त्रीजी । आखों की सर्च लाईट से देख
स्वीस बैंक के खाते में बैंलेस बढ़ तो नहीं रहा है ।
जमूरे !
हाँ उस्ताद
अब जरा आगे चल
चल दिया
क्या देखता है ?
शिष्ट मंडल विदेश रवाना हो रहा है
यानि लग्गे - भग्गे भी पिकनिक पर जा रहे हैं
नहीं उस्ताद , देश को आगे बढा कर इक्कीसवीं सदी में ले जाना है तो विदेश तो जाना ही पड़ेगा
जमूरे ! तुझे पता है गाँधीजी लंगोट पहन कर लंदन गये थे ।
हाँ ।
तो बता , लौटते समय अपने साथ क्या लाए थे ?
उनके पास टी वी ,टेप , विडियो , ब्लू फिल्म के केसेट थे और उनकी लंगोटी मेन्चेस्टर से बनकर आई थी
बकता है , शर्म नही आती झूठ बोलते, उस्ताद यह ईक्कीसवी सदी है , झूठे का बोलबाला सच्चे का मुँह काला
जमूरे एक बात बता इक्कीसवी सदी, है कैसी !
जैसे मुम्बई का नरीमन पोंइट जैसे हेमामालिनी , जैसे माधुरी दिक्षित जैसे ऐश्वर्या राय ,।
गरीबी , बीमारी बेरोजगारी का क्या हाल है ?
बिल्कुल दिखाई नहीं पड़ती
क्यों ?
क्योंकि जो भूखे गरीब बेरोजगार थे उन्हे इक्कीसवी सदी में आने ही नहीं दिया । वे बीसवी सदी मे सड़ रहे हैं और सड़ेंगे । उनसे कहा था कि इक्कीसवी सदी में चलना हो तो इन्हे छोड़ो , वे छोड़ न पाये गरीबी , और अज्ञानता , इसलिये रह गये 20वीं सदी में ।
जमूरे अब चश्मा खोल
नहीं खोलता
क्यों
क्योंकि में बींसवी सदी जैसी घटिया सदी में नहीं आना चाहता बेहतर होगा तुम भी चश्मा लगाकर 21 वी सदी में आ जाओ
अबे क्या बकता है । उठ और पेट के वास्ते जनता से मांग ।
Tuesday, July 7, 2009
परिवार में जनतंत्र यानी सारी दुनिया में जनतन्त्र
परिवार में बराबरी का आधार है बेटी का माँ - बाप की संम्पति में बेटे के बराबर का हिस्सा होना । ऐसे कुछ कानून बन चुके हैं जो कुछ हद तक इस बराबरी की इजाजत देते हैं लेकिन हम जानते हैं कि ९९ प्रतिशत मामलों में ये कानून लागू नहीं होते हैं बेटियाँ खुद भी अदालत में अपना हक माँगने नहीं जाती है । इसी तरह दहेज के खिलाफ कानून बने हुए हैं , लेकिन हम जानते हैं कि उनका उल्लंघन होता है ससुराल वालों को मालूम है कि जिसे वे अपनी बहू बनाने जा रहे हैं उसका अधिकार कानूनन उसके माता - पिता की सम्पति में है लेकिन वे यह भी जानते हैं कि यह अधिकार उसको मिलेगा नहीं , इसलिए वे सोचते हैं कि उस सम्पति में से जो लिया जा सके , वह शादी के वक्त दहेज के रूप में ले लिया जाये । खुद बेटियों के दिमाग में यह बात आती है कि बाद में तो कुछ मिलना नहीं है , इसलिए इसी समय जो मिल सके , ले लिया जाये । इस तरह एक तरफ स्त्रियों को उनके अधिकार से वंचित किया जाता है और दूसरी तरफ उस दहेज प्रथा को बढ़ाया जाता है जिसके कारण स्त्री को अपमान , उत्पीड़न और यातनायें तो सहनी ही पड़ती है , दहेज के लालची उन्हें जलाकर मार भी डालते हैं । इसलिए जब हम एक जनतांत्रिक परिवार की रचना करेंगे , तो उसमें ये दोनों बातें नहीं होगी ।
(परिवार में जनतंत्र सम्पादक रमेश उपाध्याय संज्ञा उपाध्याय पुस्तक से)
Wednesday, June 24, 2009
तालीम देने का खब्त

समाज को सभ्य बनाने में तालीम की अहम भूमिका है । पहले यही भूमिका अंग्रेज इस हद तक अदा कर रहे थे कि उन्हे हिन्दुस्तानियों को सभ्य बनाने का खब्त सवार था । कुछ लोग सभ्य हो गये इससे नुकसान अंगेजों को ही हुआ उन्हें यह मुल्क छोड़कर वापस इंग्लिस्तान जाना पड़ा । आजादी के बाद की सरकारों को भी यह खब्त सवार रहा बड़े मजे से ब्राह्मण , राजपूत और बनिये राज कर रहे थे लेकिन शिक्षा प्रदान करने के खब्त के चलते दलितों व पिछड़ों ने राजसता में भागीदारी मांगनी शुरू कर दी । जिससे हुआ यह कि अब संसद और विधानसभाओं में इन्हीं जातियों का बोल बाला है ।
जब सरकार ने नारी शिक्षा पर जोर दिया तो नारी लज्जावती न रह कर जीवन के हर क्षेत्र में पुरूष से बराबरी करने लगी । नारी शिक्षा के चलते पुरूष की सत्ता में भयंकर कमी आई वह तिलमिला कर रह गया । तालीम चीज ही ऐसी है , जो सब रिश्तो को बदल देती है अब स्त्रियों के लिए 33 प्रतिशत लोकसभा व विधानसभाओं में तथा 50 प्रतिशत पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण होगा । अभी से विरोध के स्वर तेज हो रहे हैं शरद यादव ने तो लोकसभा में यहाँ तक कह दिया कि अगर यह बिल पास हो गया तो वे जहर खा लेंगें । अब बताइये इतने जहरीले बिल को सरकार पास करवाने पर क्यों तुली है । सरकार का गणित साफ है , जनसख्या में 50 प्रतिशत महिलायें हैं इसलिए उन्हें 50 प्रतिशत सीटें मिलनी चाहिए । इसमें गैर वाजिब क्या है और जहर खाने वाली क्या बात है बल्कि मिठाई बाँटने का समय है अगर आप नहीं खड़े हो सकते तो पत्नि को खड़ी कर दीजिए । लोकसभा आप नहीं तो आपकी पत्नि जायेगी । लेकिन पावर तो आपके पास ही रहेगी । बस आप उनके सेक्रेटरी बन जाइये ।
हमारी एक सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर ‘आपरेशन ब्लेकबार्ड’ प्रारम्भ किया जिससे तालीम याफता लोगों की मानोपाली खत्म होने का मंजर सामने आया । शुक्रिया हो सरकार का कि उसने हर गाँव ढाणी में एक ब्लेकबोर्ड मुहैया करा दिया । लेकिन हुआ यह कि जहाँ ब्लेक बार्ड पहुँच गया वहाँ चाक नहीं पहुँची और जहाँ ब्लेकबोर्ड और चाक दोनों ही पॅंहुचे वहाँ गुरूजी नहीं पहुँचे , ‘अब बच्चे तो बच्चे, उन्होनें चाक लेकर ब्लेक बोर्ड पर ऐसी इबारते लिखी कि अगर अध्यापक पढ़ते तो दंग रह जाते चूंकि अध्यापक थे नहीं इसलिए दंग रहने का कार्य स्कूल निरीक्षक ने किया । उसने अपना टी. ए. डी. ए. बनाया और रिपोर्ट सरकार के पास भेज दी । रिपोर्ट में कहा गया कि फला गाँव में अध्यापक नहीं है , फलां गावं में ब्लेक बोर्ड नहीं है , फलां में स्कूल भवन नहीं है , फलाँ गावं का अध्यापक स्कूल जाता ही नहीं है । क्योंकि वह पंचायत समिति के प्रधान की हाजरी में रहता है , फिर जाकर करे भी क्या , क्योंकि वहाँ भवन , ब्लेकबोर्ड , चाक सब है लेकिन विद्यार्थी तो है ही नहीं चुनाचे वह महीने के अंत में जाकर अपनी हाजरी मांडकर तनखां उठा लेता है।
इससे भी हैरतअंगेज मंजर वहाँ दिखा जहाँ अध्यापक, छात्र , ब्लेकबोर्ड और चाक सभी थे लेकिन उनमें आपसी सामजंस्य नहीं था। छात्रों के पास कभी कापी नहीं थी तो कभी पैंसिल । कभी किताब नहीं तो कभी खेत पर जाना जरूरी था मास्टरजी हैं तो वो कभी बीमार हो जाते , तो कभी जनगणना का काम कर रहे होते तो कभी वोटर लिस्ट बनवा रहे होते या कभी फेमिली प्लांनिग के केस पटाने में जुड़े रहते तो कभी चुनाव कार्य करवाने में व्यस्त हो जाते है। जबसे मिड डे मिल योजना प्रारम्भ हुई है तब से गुरूजी सामान खरीदने , पोषाहार बनवाने , बाँटने और हिसाब -किताब का काम देख रहे हैं । कक्षा में जाने का समय ही कहाँ बचता है । सो स्टाफ ‘मिलजुलकुर खाओं और बैकुण्ठ जाओ ’ के सिद्धांत पर चल रहा है । कहने का तात्पर्य यह है कि तमाम व्यवस्था के बावजूद तालिम हैं कि हासिल ही नहीं होती अब इसमें किसी का क्या कसूर । जितनी तालिम हो चुकी है वही सरकार के गले पड़ रही है ।
अब तालिम ऐसी हो चुकी है कि हजारों-लाखों रूपये खर्च न करो तो आती ही नही है। पब्लिक स्कूलों के बच्चे फर्राटेदार अंग्रजी बोलकर , वर्नाकूलर स्कूल के बच्चों को पीछे छोड़ जाते हैं । इस तरह समर्थ फिर आगे बढ़ जाता है अब सबको शिक्षा देनी है तो ऐसे ही दी जा सकती है ।
Thursday, June 11, 2009
मौनव्रत

जिलाधीश कार्यालय के सामने शामियाने के नीचे एक आदमी अपने मुँह को दोनों हाथों से ढाँपे , गांधीजी के बंदर की मुद्रा में बैठा है । ठीक उसके ऊपर एक बैनर टंगा है बैनर पर मौन व्रत लिखा है । कुछ और खद्दरधारी उसी मुद्रा में उसके दोनों ओर धरने पर बैठ जाते है। जिलाधीश को ज्ञापन देना है । कौन ज्ञापन देगा पहले से ही तय हो तो उचित रहेगा , नहीं तो वहाँ हड़बड़ी में मौन जुलुस की भद्द पड़ जायेगी ।
पत्रकारों और फोटोग्राफरों का प्रवेश। विडियों कैमरा काम कर रहा है , पत्रकार ने पूछा - देश में आपातकाल लागू है आपकी प्रतिक्रिया! वे मौन है
1984 के सिक्ख विरोधी दंगों के बारे में आपका क्या कहना है ? वे मौन है
बाबरी मस्जिद को तोड़ डाला इस सन्दर्भ में आपका क्या कहना है ? वे मौन है
अहमदाबाद में हिन्दु मुस्लिम दंगे में लागों को जिन्दा जला दिया गया है , कौन इसके लिए जिम्मेदार है वे फिर मौन है
उत्तर न पाकर पत्रकार ने उकसाया -
जब भी कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेना होता है , आप लोग मौन साध लेते हैं । मुख्य बंदर मौन व्रत धारी उन्हें चुप रहने का आखों से इषारा करता है पत्रकार अनुनय करता हे , लिखित वक्तव्य ही दे दीजिए
‘‘सार्थक संवाद केवल मौन में ही सम्भव है
कौन जिम्मेदार है , अपने मांही टटोल ,
आत्मा को शुद्ध करो , मौन भटको को रास्ते पर लाता है ।
शब्द झगड़े की जड़ है । मौन शान्तिपूर्ण और प्रेममय है ।
मौन में सारी समस्याएं समाप्त हो जाती है ’’
मौन धीरे - धीरे असाध्य लगने लगता है कुछ लोग खुजलाते है , एक -दो हथेली पर तम्बाकु घिसते हैं । कई अपनी पुड़िया खोल कर खाते है । दर्शकों में से लड़के - लड़कियाँ आँख लड़ाने की कोशिश करते है।
जुल्म, अन्याय व अत्याचार के विरूद्ध मौनजुलूस, बेरोजगारी व गरीबी के विरूद्ध मौन जुलुस , मौन रामबाण है अतः सरकार मौन रहने का मूलभूत अधिकार सबको देती है बोलने की बदतमीजी की आज्ञा सिर्फ सिरफिरों को है । सरकार मौनव्रत धारी बंदरों की मूर्तियों को सार्वजनिक स्थानों पर स्थापित किये जाने के आदेश देती है और मौनव्रत धारियों का धन्यवाद करती है
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Wednesday, June 3, 2009
डाकुओं की संगठित गेंग के बारे में हलफिया बयान

डाकुओं की संगठित गेंग के बारे में हलफिया बयान
पुलिस के बारे में एक जज साहेब ने टिप्पणी की थी कि पुलिस डाकुओं की एक संगठित गेंग है । भई ! यह तो बहुत ही सख्त टिप्पणी है पुलिस सेवा के बारे में । चूंकि जज साहब को तो सरकार चलानी नहीं , इसलिए वे तो ऐसी टिप्पणी कर सकते हैं लेकिन यह तो सरकार ही जानती है कि पुलिस किस कदर जनता की सेवा व सुरक्षा में चैबीस घंटे लगी हुई है ।
आलतू - फालतू आन्दोलनों को तोड़ने व फोड़ने , मरोड़ने व कुचलने का कार्य भी यही गेंग सरअंजाम देती है । विरोधियों के छक्के छुड़ाने व छठ़ी का दूध याद दिलाने का काम भी इसी के जिम्मे है । क्योंकि सरकार यह काम नहीं कर सकती इसलिए यह काम पुलिस के द्धारा करवाया जाता है जिससे देश में अमन चैन बना रहता है ।
और फिर उन्हें डकैत कहना तो खुला झूठ है , डकैत हमेशा खुले में लूटमार करते हैं जबकि पुलिस कभी ऐसा नहीं करती , वह हमेशा प्रछन्न तरीके अपनाती है । उसके लिए बकायदा प्रत्येक थाने में, पहुॅंच रखने वाले लोग होते हैं , वे राजनैतिक दल के कार्यकर्ता हो सकते है , कुछ छटे हुए बदमाश भी यह काम करते हैं कुछ वकील लोग भी यह काम करते हैं क्योंकि यह उनकी प्रेक्टिस की परिभाषा में आता है । इन लोगों का काम है मुर्गी फांसना और फिर थाने में होती है मुर्गी हलाल । जो मुर्गी फांसकर लाते हैं थाने में , उनकी समाज में बड़ी इज्जत होती है , इससे ही अंदाज लगाइये कि पुलिस की समाज में कितनी इज्जत होगी । इनसे पंगा लेना , मौत को दावत देना है । इज्जतदार लोगों से आम जनता हमेशा थरथराती रही है । अब आप ही बताइये कि वे कौनसे कारनामे हैं जिसकी वजह से सरकार को यह नियम बनाना पड़ा कि थानेदार किसी स्त्री का बयान थाने में बुलाकर नहीं ले सकता ।
पाठ पढ़ाने में हमारी पुलिस का कोई सानी नहीं है । थर्ड डिग्री क्या होता है ये वे लोग ठीक से जानते हैं जिनके घुटनें की टोपियाॅं टूट गई या हाथ - पाॅंव की हड्डियाॅं टूट गई , जिनके मुहॅं में मूता गया और गवाही चाहिए तो जुगता की लो जिसका लिंग तक उन्होनंे काट दिया ।
यह सब इसलिए किया जाता है कि अपराधियों में हाथ - पाॅंव टूटने का डर नहीं होगा तो अपराध रूकेंगे कैसे सरकार के वक्तव्यों और भाषणों से तो अपराध रूकने से रहे न ही कोर्ट कचहरी के भरोसे अपराध रूकेंगे । पुलिस जब सीधी और स्वविवेक से कार्यवाही करेगी तब ही अपराध जगत में दशहत फैलेगी ।
लेकिन ऐसा क्यों होता है कि दशहत आम लागों में फैल जाती है और अपराध जगत के बीर बांकुरे थाने में बैठे मूंछों पर ताव देते रहते हैं ।
Friday, May 15, 2009
लडो डट कर लडो

लडो डट कर लडो
भाई -भाई लड़ते है] हिन्दु मुस्लिम भाई - भाई है] इसलिए आपस में लड़ते है। अगर भाई - भाई नहीं होते तो आपस में नहीं लड़ते । पहले हिन्दी चीनी भाई -भाई थे इसलिए आपस में लड़े । जब से दुश्मन हुए है] नहीं लड़े ।
जब हम कहते हैं कि हिन्दु - मुसलमान लड़ते हैं तो इसका तात्पर्य है कि हिन्दु - हिन्दु नहीं लड़ते , मुसलमान - मुसलमान नहीं लड़ते लेकिन पश्चिमी पाकिस्तान , पूर्वी पाकिस्तान से लड़ा , इराक कुवैत से लड़ा , इरान - इराक लड़े , लोगों को बिना लड़े चैन नहीं मिलता सो लोग आपस में लड़ते है।
संजीदा लोगों को भाइयों के झगड़ों में नही पड़ना चाहिए । सरकार को भी चाहिए कि वह भाई - भाई के झगड़ों में अपने कानून का डंडा नहीं घुमाएं बल्कि लड़ने के लिए स्टेडियम प्रदान करे और टिकट लगाकर तमाशा दिखाए ताकि सरकार का रेवेन्यू बढे।
कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें लड़ने का नही लड़ाने का शौक है उन्हें लोगों को लड़ाये बिना चैन नहीं मिलता । जैसे नवाब पहले मुर्गे लड़ाते थे ,आजकल के नवाब आदमियों को लड़ाते हें जैसे मीणा को गूजर से दलित को ब्राहण से] पिछड़े को अति पिछड़ें से ।
आजादी के बाद का इतिहास आपस में लड़ने का इतिहास रहा है आजादी प्राप्त होते ही हिन्दु - मुसलमान लड़े , फिर मराठी - तेलगू , यानि भाषा के नाम पर लड़े , प्रांतो पर लड़े , नदियों के बंटवारें को लेकर लड़े , हिन्दु - सिक्ख जम कर लड़े , बाबरी मस्जिद को लेकर कारसेवक मुसलमान से लड़ मरे आदिवासी - गैर आदिवासी लड़े , कम्यूनिस्ट कम्यूनिस्ट से लड़े , नकस्ली सरकार से लड़े , आरक्षण हितेषी - आरक्षण विरोधी से लड़े भारतीय मुजाहदीन और अभिनव भारत लोगों को लामबन्द कर रही है । नहीं लड़ने वाले की लड़ने वाले नहीं सुनते वे कहते है तुम यह बताओ कि तुम किस तरफ हो । किसी भी तरफ नहीं हो तो हिजड़ै हो । लड़ो - डट कर लड़ो । आमीन
राजनीति में सती सावित्री
(राजनीति में आई एक स्त्री के प्रति लोगों (पुरूषों) का क्या दृष्टिकोण है जरा मुलाहिजा फरमाइये। )
राजनीति में सती सावित्री का क्या काम ! फिर भी सावित्री ने तय किया कि अब वह राजनीति करेगी उसने पार्टी अध्यक्ष से मुलाकात की । अध्यक्ष ने सावित्री का स्वागत करते हुए कहा कि महिलाओं को राजनीति में आगे की पंक्ति में आना चाहिए । हमारा सौभाग्य है कि आप आई, अध्यक्ष ने उनके सुन्दर चेहरे को लक्ष्यकर आश्वस्त किया कि आपको किसी पार्टी पोस्ट पर एडजस्ट कर दिया जायेगा ।
अध्यक्ष जी ने उनकी उम्र, शैक्षणिक यौग्यता व कार्य में दिलचस्पी को देख उन्हें पार्टी की युवा शाखा का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया ।
अध्यक्षजी ने कहा पद जिम्मेदारी का है और उसमें पूरे प्रदेश के दौरे करने पड़ेगें । मेरे दौरे का प्रोग्राम बन गया है आप मेरे साथ चलेगी । सावित्री मना कैसे करती!
एक दौरे के बाद ही कार्यकर्ताओं में कई किस्से प्रचलित हो गये । अध्यक्षजी ने क्या चीज पकड़ी है ! जैसे अध्यक्षजी चील हो और सावित्री चिड़िया । ‘यार अध्यक्षजी के तो मजे है। अब तो और अधिक दौरे होंगे । अबकि बार सावित्री का विधानसभा का टिकिट पक्का है । अध्यक्षजी ने सारा भार सावित्री पर डाल दिया है। सावित्री को अफसोस था कि उसकी योग्यता और कार्य को कोई नहीं देख रहा है । निराशा के क्षणों में सावित्री ने अध्यक्षजी से कहा - बहुत हो गया , राजनीति छोड़ मैं अब सत्यवान के पास वापस जाउंगी ।
अभी तो तुम्हारे पाँव भी नहीं जमे है। मैं मुख्यमन्त्री से कहकर किसी निगम की अध्यक्ष बनवा देता हूँ ताकि तुम्हारा खर्चा पानी चल सके । और फिर अगले साल इलेक्शन है अभी से भाग दौड़ कर टिकट पक्का कर लो । अब मुख्यमन्त्रीजी को तो ‘गुडह्युमर’ में रखना ही होगा न । जिला व राज्य कमेटी को भी विश्वास में लेना होगा ।
पार्टी कार्यकर्ता जानते हैं कि सावित्री सबको विश्वास में ले लेगी । कार्यकर्ता सावित्री पर पूरी नजर रखे थे । उसकी पहुँच कहाँ - कहाँ तक है और क्यों है ?
ज्यों - ज्यों सावित्री के बारे में किस्से कहानियाँ फैलती गई । उसकी पुहॅंच भी ऊँची होती गई । कार्यकर्ता अपना काम निकलवाने के लिए सावित्रीजी का उपयोग करने लगे और मौका मिलने पर नजर भी फैंक लेते क्या पता चिड़िया फॅंस ही जाये ।
सावित्री का संघर्ष तब तक समाप्त नहीं होगा जब तक कि वह विधायक बनकर मन्त्री की कुर्सी पर न बैठ जाये ।
विधानसभा चुनाव आ गये , तो सावित्री को टिकट मिल गया । अब तो पार्टी वर्कर चौडे में बोलने लगे । फलाने के साथ हमबिस्तर हुई थी] साली को एक ही रात में टिकट मिल गया और जो दसियों वर्षो से राजनीति कर रहे हैं उन्हें टका सा जवाब दे दिया - महिलाओं को आगे लाना है ।
जब सावित्री पुरूष मतदाता की ओर उन्मुख हुई तो उसका चेहरा निहार कर वे अपने को धन्य मानते । अपनी ही पार्टी के विरोधी तमाम तरह के किस्से जनता में फैलाने लगे थे । जनता भी क्या चीज है जो इस तरह की बातों पर सहज ही विश्वास कर लेती है । नतीजा , अपनी पूरी इज्जत उतरवाकर भी सावित्री हार गई ।
Friday, May 1, 2009
श्याम पोकरा के उपन्यास बेलदार का लोकार्पण

सुरेश छाबडा(कुरते में.)अरूण भट्ट,सोहनसिंह केलवा,विजय जोशी,भगीरथ,
श्याम कुमार पोकरा व दिनेश छाजेड




